"सब तेरा ही"
तेरी तस्वीर,
तेरा ख्याल,
तेरी याद
और तेरा ख्वाब...!!
सब तेरा ही रख रखा है,
मैंने अपनी चार दीवारों में...!!
"बंधनों के कई रूप होते हैं"
"सात फेरों का बंधन
सात जन्मों का बंधन,
जन्मों जन्मों का बंधन"
पर एक बंधन और भी होता है...
"मन से मन का बंधन"
रेशम सा...
बहतें नीर सा..
हवाओं मे बहता सा..
महकते इत्र सा..
बांधे एक ही डोर से..
मन से मन को...
हर भीड़ मे तलाशती..
एक दूसरें को..
उस नाम को..
उसके लिखे शब्दों को..!!
यही तो है,
मन से मन का बन्धन !!
देखते सुनते...जाने कब..कैसे..
खुद की आत्मा...मन...और मौन,
मिल से ज़ातें हैं...बंध से जाते हैं..
और
फिर...प्रेम हो ज़ाता है..
बस हो ज़ाता है...
एक दूसरे को..मन से मन को..!!
शायद इस बंधन में...
कोई अग्नि साक्षी नही..
हवन नही..
कोई सात वचन नहीं..!!
पर सबसे निकट..अलग है य़े,
न बांधने की चाहत...
न छूटने का मन...
बस ऐसा है य़े,
"मन से मन का बंधन"
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